Tuesday, 25 February 2014

हस रहा है वक़्त आज भी!

कभी सोचा है क्या किसी ने 
क्यों रहती थी नारी इतनी भयभीत 
बढ़ तो रही थी, पढ़ तो रही थी 
फिर कैसे पनपने लगा उसमे आत्मसम्मान 
जिसे कहने लगे ये लोग और ये समाज अभिमान 

जब समझ खुद को दुशासन 
चीर कर हर द्रौपदी का हरण 
दे रहे थे उदाहरण 
बिन माथे पर कोई शिकन 

जब सारे गणो ने 
मात्र भोग का सामान बनाया 
तो आज कहाँ कुछ बदला था इंसान 
जो रहा वो मानव , लिप्त संग माया 

बहुविवाह  और रास लीला 
दूतों ने भी था रचाया 
फिर आज क्यों दोषी रहा कलयुग 
जब आदि के गर्भ में ही था 
हर अंकुर समाया 

कल भी न समझा था जग ने 
है कोई खुद का अस्तित्व नारी का 
सती होने के नियम बनाया 
और हर एक मुस्कान को पति की चिता में ही जलाया 

दे न पायी जो वंश उसे 
तिरस्कृत कर क निकाला 
और साथ जिसने वनवास बिताया 
उसे समक्ष समाज के परीक्षित कराया 

हस रहा है आज वक़्त भी 
रहा है जो हर ज़िल्लत का दर्शक 
श्रोता रहा जो हर पुराण का 
और तरस खता है आज पे 
दोषारोपण हो रहा जिस पे 
और अगर है किसी ने आवाज़ उठाई 
तो कहलायी जाती है वो असंस्कारी
और उभरती हुई बुराई। 

पर हस रहा है वक़्त आज भी
पर हस रहा है वक़्त आज भी। 

Tuesday, 4 February 2014

बचपन का वो स्वाद.. :)

पलटते पलटते खुद के पन्नो को 
पहुची मैं एक अद्ध्याय पर 
जल्दबाज़ी में जिससे गुज़र गयी थी 
दोहराया उसे फिर शाम तक 
स्याही भी गयी थी घुल कागज़ पर 
और अक्षरों का हिसाब कुछ बिगड़ सा गया था 
पर याद था मुझे वो लम्हा मद्धम सा 
जिसमे मैंने अपना एक अक्स जिया था 
कुछ खट्टी कुछ मीठी वो इमली सी बातें 
वो बचपन कि सुबह, वो सुकून कि रातें 
नानी का सिरहाने बैठ कहानी सुनना 
नाना का ढेरो पकवान ले आना 
दादी का सर पे तेल लगाना 
और बाबा का हर रोज़ छेड़ना चिढ़ाना 
गुड्डो गुड़ियों कि शादी रचाना 
और किसी भी बहाने से दावत उड़ाना 
न थी परेशानियां, ना माथे पर शिकन 
बस उलझ कर रेह जाते थे हम किसी खेल में 
और हारने से बच जाते थे कच्ची मिट्टी केह कर 
और जब चाहते थे दुनिया से बचना
 तो माँ होती थी हर दम साथ  
आँचल में छुपा लेती थी अपने 
और सुन लेती थी सबकी बात 
थोडा सा बिगाड़ कर , थोडा सा संवार कर 
मना लेती थी हर बार 
गुल्लक को सिक्कों से भरकर 
बन जाते थे रईस 
और पापा के पीछे छुप जाते थे 
जब पड़ती थी माँ से फटकार 
स्कूल और पढाई , दो ही करती थी जीना दुश्वार 
और हर लड़ाई कि कहानी होती थी 
कट्टी से मिल्ली तक हर बार 
ज़िन्दगी थी बस इतनी सी मुश्किल 
बस इतनी सी संगीन और था मन में प्यार 
शायद बड़े होने कि होड़ में मगर 
कहीं छूट गया है वो संसार 
पर उस बचपन को जी लेना ज़रूर तुम
मिले अगर मौका  फिर एक बार 
ज़रिये खुद के या किसी बच्चे के 
और चख लेना चटकारों के साथ  
बचपन का वो स्वाद।

Friday, 24 January 2014

कहते हैं लोग ..! :)

कभी कभी कहते हैं लोग 
की कुछ ज़यादा ही विशाल हैं मेरी आकांक्षाएं 
और कभी रोकते हैं मुझे 
की ऊंची हैं कुछ ज़यादा मेरी उड़ाने , ये कहकर 
गिर जाओगी , डराते हैं अक्सर वो मुझको 
ठोकरों कि देते हैं दुहाई 
रेह रेह कर झकझोरते हैं मुझको 
ताकि लौट आऊँ जो हकीकत है उसमे
 जिसे परिभाषित किया है खुद उन्होंने 
जिसे मांपा है खुद के अनुसार 
कर अनदेखा उस तीर को 
है हर लहर बेकरार 
भूल गए हैं वो कि इस वेग में 
 हर पत्थर , हर विकार 
और प्रज्ज्वलित हो अगर उम्मीद कि मशाल 
तो बुझती नहीं है किसी झोंके से , रहती बेमिसाल 
हर वो हिचक जो सपने में होती है किसी के 
वो बन जाती है उसकी असलियत अगर 
जज़बे से जिगर के प्याले को भर कर 
चुस्कियां लेता हो धूप में भी , बिन किये सवाल 
अपनी इच्छा को मैं ढालूँगी खुद 
जिस भी ढाँचे में पिघला कर 
बनेगी मेरा वो वर्त्तमान, भविष्य और आकार 
क्यूंकि मेरी ज़िन्दगी है बनी मेरी शर्तों पर 
और रुकूँगी कभी भी थक कर 
जिस मुकाम को करा था उन्होंने नामुमकिन करार 
मेरी मंज़िल तो वही है राही 
और बनाउंगी अब एक मिसाल , एक प्रेरक किरदार 

Thursday, 2 January 2014

Published my first poem in NBT-Mumbai on 1st January 2014! :)
Thank you everyone who read and appreciated my work and encouraged me always! :)



Tuesday, 31 December 2013

सन्देश...

हर नवीन आरम्भ में 

किसी इतिहास कि नींव ज़रूर होती है 

हर भविष्य का बीज 

किसी अतीत में ही ज़िन्दगी बोती  है 

हर नए संकल्प के पीछे एक उद्देश्य छुपा होता है 

और हर उम्मीद कि राह में 

हज़ारों नाकामियाबियों कि ठोकरें बिछी होती हैं 

अब जब शुरू हुआ है एक नया साल

इच्छा तो है कि लाये कुछ इस बार 

जिसकी आस लगाये बैठे थे हम न जाने कब से 

पर झलक तक न दिखी थी पूर्व काल 

कोई कठिन संकल्प तो नहीं है लेकिन 

कोशिश है बस कुछ बातें निभाने की  

थोड़ी सी ख़ुशी खुद को 

और थोड़ी सी हँसी दूसरो के होठो पे सजाने की  

अगर कभी बीते दिन मेरा नागवार 

तो शाम को उसे झटक के भुला जाने की  

और अगर कभी गम हो किसी बात का

तो उसे किसी छोटी सी ख़ुशी के ख्याल में घुलाने की  

कोशिश कि उम्मीद नहीं छोड़ूंगी

कितने भी दिन हो जाये नासूर 

और कभी न पकडूँगी कोई भीगी डोर

जिसे कभी अपने आंसुओं से गीला कर दिया था

बस रखूंगी पोटली में मुट्ठी भर जहान

थोड़ी सी ज़मीन और थोड़ा सा आसमान 

और दृढ़ता से रखूंगी विश्वास 

कि होगा हर आगाज़ का अंत कुछ ख़ास 

और इस नव वर्ष को बनाउंगी, है प्रयास 

एक अद्ध्याय जिसपे होगा मुझे कल नाज़

यही है मेरा सन्देश हर व्यक्ति के नाम ।